आज सोशल मीडिया के दौर में भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले अब्राहमिक परंपरा के अनेक लोग अक्सर यह तंज कसते हैं कि “अब तुम्हारे नए पापा इज़राइल हैं।” इसके जवाब में यहाँ से भी कई नाम गिना दिए जाते हैं—कभी सऊदी अरब, कभी यमन, कभी सीरिया, कभी इराक, कभी तुर्की और अब ईरान। कभी-कभी तो पाकिस्तान भी “पार्ट-टाइम अब्बू” बन जाता है।
लेकिन असल सवाल यह है कि भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा अंततः किसके साथ खड़ा दिखाई देता है और क्यों?
व्यापक तौर पर देखें तो बहुत से भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज का एक हिस्सा, वैचारिक और ऐतिहासिक कारणों से इज़राइल के प्रति सहानुभूति रखता है। जबकि भारत की सरकारें सामान्यतः कूटनीतिक संतुलन बनाए रखती हैं, पर जनमानस का दृष्टिकोण कई बार अलग दिखाई देता है। इसके जवाब में इज़राइल और यहूदियों के विरुद्ध तरह-तरह के तर्क दिए जाते हैं—कभी उन्हें मानवता के लिए खतरा बताया जाता है, तो कभी विश्व राजनीति की सारी समस्याओं का कारण।
फिर भी अनेक लोग यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि उन्हें इतिहास में एक ऐसे समुदाय के रूप में देखा जाता है जिसने लंबे समय तक उत्पीड़न, विस्थापन और नरसंहार झेले, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा।
इतिहास पर नज़र डालें तो भारतीय उपमहाद्वीप पर कई बाहरी शक्तियों ने आक्रमण किए—यूनानी, फ़ारसी, हूण, तुर्क, मंगोल आदि। लेकिन मध्यकाल में जब पश्चिम से आने वाली नई धार्मिक-राजनीतिक शक्तियाँ आईं, तब युद्ध की शैली और उद्देश्य दोनों अलग थे। भारतीय परंपरा में युद्ध के कुछ नैतिक नियम और सीमाएँ मानी जाती थीं, जबकि नए आक्रमणकारी कई बार उन मानकों से भिन्न तरीके से लड़ते थे। इससे समाज में गहरा सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।
ऐसा ही कुछ इतिहास फारस (पर्सिया) में भी देखा गया, जहाँ एक अत्यंत विकसित और समृद्ध सभ्यता होने के बावजूद अरब आक्रमणों के बाद राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तन तेज़ी से हुए। उस समय पारसी समुदाय का एक हिस्सा अपनी परंपराओं को बचाने के लिए भारत आ गया। भारत ने उन्हें आश्रय दिया और वे यहाँ की सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा बन गए।
इसी तरह यहूदियों का इतिहास भी विस्थापन और संघर्ष से भरा रहा है। यूरोप और पश्चिम एशिया में उन्होंने लंबे समय तक भेदभाव और हिंसा झेली, फिर भी अपनी पहचान को बनाए रखा।
शायद यही कारण है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखने वाले समुदाय एक दूसरे के प्रति सहज सहानुभूति महसूस करते हैं। यह एक स्वाभाविक मानवीय भावना है—जो लोग अपनी परंपरा और अस्तित्व को बचाने के संघर्ष से गुज़रे हों, वे दूसरे ऐसे ही समुदायों के दर्द को समझ पाते हैं।
इसलिए जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी सभ्यताएँ या समुदाय एक-दूसरे से जुड़ाव महसूस करते हैं, तो यह केवल राजनीति का विषय नहीं होता; यह इतिहास, स्मृति और सांस्कृतिक अनुभवों का भी परिणाम होता है।